कुंडली दोष

ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार जन्म कुंडली में कई प्रकार के श्रापित दोष होते हैं आप माने या ना माने लेकिन आपकी जीवन की गति और चाल केवल ग्रहों की वजह से ही चलते हैं और ग्रहों से जो दोष बनते हैं इस दोष से आपके जीवन में सफलता और असफलता का सामना करना पड़ता है जो इस प्रकार है……

  • मांगलिक दोष
  • काल सर्प दोष
  • गुरु चांडाल दोष
  • पितृ दोष
  • ग्रहण दोष
  • गअमावस्या दोष
  • केमद्रुम दोष

मांगलिक दोष:- कुंडली में यदि मंगल दोष है जिसकी वजह से व्यक्ति को विवाह संबंधी परेशानियों, रक्त संबंधी बीमारियों और भूमि-भवन के सुख में कमियां रहती हैं. कुंडली में जब लग्न भाव, चतुर्थ भाव, सप्तम भाव, अष्टम भाव और द्वादश भाव में मंगल स्थित होता है तब कुंडली में मंगल दोष माना जाता है.

काल सर्प दोष:-ज्योतिष् शास्त्र के मुताबिक, अगर किसी की कुंडली में सर्प दोष बनता है तो ऐसी योग में उत्पन्न जातक के व्यवसाय, धन, परिवार, संतान आदि के कारण जीवन अशांत हो जाता है. राहु केतु को छाया ग्रह कहा जाता है. राहु केतु के कारण ही कालसर्प दोष बनता है क्योंकि राहु का नक्षत्र भारणी है.

गुरु चांडाल दोष:- जिस जातक की कुंडली में गुरु चांडाल दोष यानि कि गुरु-राहु की युति हो वह व्यक्ति क्रूर, धूर्त, मक्कार, दरिद्र और कुचेष्टाओं वाला होता है. ऐसा व्यक्ति षडयंत्र करने वाला, ईष्या-द्वेष, छल-कपट आदि दुर्भावना रखने वाला एवं कामुक प्रवत्ति का होता है, उसकी अपने परिवारजनों से भी नहीं बन पाती. वह खुद को अकेला महसूस करने लग जाता है.

पितृ दोष:-कई लोग इसे पितृ यानि पूर्वजों के बुरे कर्मों का फल मानते हैं तो कुछ का मानना है कि अगर पित्ररों का दाह-संस्कार सही ढंग से ना हो तो वह नाखुश होकर हमें परेशान करते हैं. कुंडली में पितृ दोष तब होता है लग्नेश पंचमेश और भाग्य में राहु केतु विराजमान होता है तो यह दोष प्रबल होता है

ग्रहण दोष:-जब सूर्य या चन्द्रमा की युति राहू या केतु से हो जाती है तो इस दोष का निर्माण होता है. चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण दोष की अवस्था में जातक डर व घबराहट महसूस करता है. चिड़चिड़ापन उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाता है. माँ के सुख में कमी आती है. किसी भी कार्य को शुरू करने के बाद उसे सदा अधूरा छोड़ देना व नए काम के बारे में सोचना इस दोष के लक्षण हैं.

अमावस्या दोष:-जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों कुण्डली के एक ही घर में विराजित हो जावे तब इस दोष का निर्माण होता है. जैसे की आप सब जानते है की अमावस्या को चन्द्रमा किसी को दिखाई नहीं देता उसका प्रभाव क्षीण हो जाता है. ठीक उसी प्रकार किसी जातक की कुंडली में यह दोष बन रहा हो तो उसका चन्द्रमा प्रभावशाली नही रहता और चन्द्रमा को ज्योतिष में कुण्डली का प्राण माना जाता है और जब चन्द्रमा ही प्रभाव हीन हो जाए तो यह किसी भी जातक के लिए कष्टकारी हो जाता है क्योंकि यही हमारे मन और मस्तिक का कारक ग्रह है.

केमद्रुम दोष:-चन्द्रमा से बनने वाला ये दोष अपने आप में महासत्यानाशी दोष है यदि चंद्रमा से द्वितीय और द्वादश दोनों स्थानों में कोई ग्रह नहीं हो तो केमद्रुम नामक या दोष बनता है या फिर आप इसे इस प्रकार समझे चन्द्रमा कुंडली के जिस भी घर में हो, उसके आगे और पीछे के घर में कोई ग्रह न हो.

दोष पूर्व जन्म के या इसी ज्न्मे के हो सकते हैं:-यह दोष पूर्व जन्म के भी हो सकते हैं या फिर इसी जन्म के भी. कुंडली दोषपूर्ण होने की स्थिति में जिस ग्रह को प्रभावित करती है उसके शुभ फल जातक को नहीं मिल पाते. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा ग्रहों की चाल से उस जातक को मिलने वाले अशुभ प्रभाव के कारण होता है. इसके प्रभाव क्षणिक हो सकते हैं और दीर्घकाल तक भी जारी रह सकते हैं.

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